1857 ई. के विद्रोह की प्रमुख घटनाओं
प्रश्न : 1857 ई. के विद्रोह की प्रमुख घटनाओं का विवरण दीजिए।
उत्तर :
1857 ई. के विद्रोह के समय भारत का गवर्नर जनरल लॉर्ड कैनिंग था। डलहौजी
ने “गोद निषेध नीति' और 'हड़प नीति' के आधार पर अनेक राज्यों को जबरन ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया।
डलहौजी ने मुगल बादशाह को दिल्ली का
लाल किला खाली करने के लिए विवश किया। डलहोजी ने इनाम कमीशन की नियुक्ति कर दक्षिण भारत
की तीस हजार जमींदारियाँ जब्त कर लीं। अँगरेजों द्वारा
भारतीयों के धार्मिक-सामाजिक मामलों में
दखल, सैनिकों के प्रति भेदभाव, अँगरेजों की लगान नीति आदि के कारण देश में असंतोष एवं विद्रोह की भावना प्रबल थी।
इन परिस्थितियों में विद्रोह की योजना
बनी। झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई, पेशवा बाजी राव के दत्तक
पुत्र नाना साहब, धुन्धू पन्त, उनके वकील अजीमुल्ला खाँ, मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर, उनकी मल्का
जीनत महल, अवध के नवाब की बेगम हजरत महल, बिहार के जगदीशपुर के कुँवर सिंह और
तात्यांटोपे 1857 ई. के विद्रोह के प्रमुख नेता थे।
विद्रोहियों ने निश्चय किया कि विद्रोह
दिल्ली के मुगल सम्राट बहादुरशाह के नाम पर 31मई, 1857 ई. के दिन आरम्भ किया जाय और अँगरेजों
को भारत से भगाने के पश्चात् बहादुरशाह को भारत का सम्राट बनाया जाय।
1857 ई. के विद्रोह के विस्फोट का तांत्कालिक कारण 'चर्बी वाले कारतूस' की कहानी थी। सेना में विद्रोह “बंगाल आर्मी” नामक रेजिमेन्ट से प्रारम्भ हुआ। दुर्भाग्यवश
कारतूस वाली घटना के कारण
विद्रोह बेरकपुर छावनी में समय से पहले 29 मार्च 1857 ई. को ही हो गया।
29 मार्च, 1857 ई. को बंगाल आमी के मंगल पाण्डे नामक एक सैनिक ने बैरकपुर में
विद्रोह का झण्डा खड़ा कर दिया। मंगल पाण्डे, जिसने एक अँगरेज अफसर की हत्या की थी, को बन्दी बना लिया गया और उसे मौत की सजा दी गयी। इस्नके
बाद विद्रोह पूरे देश में फैल गया।
विद्रोहियों ने 11 मई, 1857 ई. को दिल्ली के लाल किले पर अपना अधिकार कर लिया ओर बहादुरशाह को भारत का सम्राट घोषित किया। नानश साहब ने कानपुर पर
अपना अधिकार कर अपने को वहाँ का पेशवा घोषित किया। बुन्देलखण्ड में झाँसी की रानी लक्ष्मी
बाई ने और मध्य भारत में तात्यांटोपे
नामक एक मराठा ब्राह्मण ने क्रांतिकारियों का नेतृत्व किया और
विद्रोह का संचालन किया। बिहार में
जगदीशपुर के कुँवर सिंह ने विद्रोह का नेतृत्व किया।
विद्रोही सेनाओं के विरुद्ध फौजी
कार्रवाई करने के पूर्व अंग्रेजों ने कई कानूनों को पारित किया और इनके अनुसार सम्पूर्ण उत्तर भारत में मार्शल लॉ लागू कर दिया, केवल शक के आधार पर किसी हिन्दुस्तानी को कैद किया जा सकता था और उनपर मुकदमा चलाकर सजा दी जा
सकती थी। सिख एवं गुरखा सैनिकों की सहायता से विद्रोह के दमन में अँगरेजों को सफलता
मिली।
अँगरेजों ने कश्मीरी दरवाजे को बारुद से
उड़ा दिया तथा छः दिनों के भयंकर युद्ध के पश्चात् दिल्ली नगर तथा महल पर अधिकार कर लिया।
प्रतिशोध और सबक सिखाने की चाह के कारण अंग्रेजों ने विद्रोहियों को अत्यन्त निर्ममता से मौत
के घाट उतारा। उन्हें तोपों के मुँह से बाँधकर उड़ा दिया गया फाँसी पर लटका दिया गया।
बहादुरशाह को बन्दी बना लिया गया तथा
उसके पुत्र और पौत्र को कर्नल हडसन ने गोली से उडा दिया। बहादुरशाह को भारत से निर्वासित
करके रंगून भेज दिया गया जहाँ बेकसी के दिन काटते हुए मुगलों के अंतिम बादशाह का 862 ई. में निधन हो गया। तात्यांटोपे पकड़ा
गया और उसे फाँसी पर लटका दिया गया।
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